प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा

About Me

मेरा फोटो
Ram Krishna Gautam
मैं हूँ... एक कहानी… जिसमें कोई किरदार नहीं, एक बादल जिसमें नमी की एक बूँद नहीं, एक समन्दर… जिसमें सब कुछ है, जिसके लिए कुछ नहीं, और ऐसा ही सब कुछ… नाम है "रामकृष्ण गौतम"... एक अधूरा ख्वाब..!
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

समर्थक

अपनी भाषा में पढ़ें!

जनोक्ति डाट कॉम

RAJ -SAMAJ AUR JAN KI AAWAZ

चिट्ठाजगत!

चिट्ठाजगत

शीघ्र प्रकाशन!

चिट्ठाजगत

सक्रियता क्रमांक!

हवाले की कड़ी!

ब्लागवाणी!

Blogvani.com

क्लिक करें, पसंद बताएँ!


शुक्रवार, अप्रैल 09, 2010

डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनीमेन (जन्म 1755-मृत्यु 1843 ईस्वी) होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के जन्मदाता थे।डॉ. हैनीमेन यूरोप के देश जर्मनी के निवासी थे। इनके पिता एक पोर्सिलीन पेन्टर थे और आपने अपना बचपन अभावों और बहुत गरीबी में बिताया था।

एमडी डिग्री प्राप्त एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान के ज्ञाता थे। डॉ. हैनिमैन, एलोपैथी के चिकित्सक होने के साथ-साथ कई यूरोपियन भाषाओं के ज्ञाता थे। वे केमिस्ट्री और रसायन विज्ञान के निष्णात थे। जीवकोपार्जन के लिये चिकित्सा और रसायन विज्ञान का कार्य करने के साथ-साथ वे अंग्रेजी भाषा के ग्रंथों का अनुवाद जर्मन और अन्य भाषाओं में करते थे। एक बार जब अंगरेज डाक्टर कलेन की लिखी कलेन्स मेटेरिया मेडिका में वर्णित कुनैन नाम की जड़ी के बारे मे अंगरेजी भाषा का अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे तब डॉ। हैनीमेन का ध्यान डॉ. कलेन के उस वर्णन की ओर गया, जहां कुनैन के बारे में कहा गया कि यद्यपि कुनैन मलेरिया रोग को आरोग्य करती है, लेकिन यह स्वस्थ शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा करती है।कलेन की कही गयी यह बात डॉ. हैनीमेन के दिमाग में बैठ गयी। उन्होंने तर्कपूर्वक विचार करके क्विनाइन जड़ी की थोड़ी-थोड़ी मात्रा रोज खानी शुरू कर दी। लगभग दो हफ्ते बाद इनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये।


जड़ी खाना बन्द कर देने के बाद मलेरिया रोग अपने आप आरोग्य हो गया। इस प्रयोग को डॉ। हैनीमेन ने कई बार दोहराया और हर बार उनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये। क्विनीन जड़ी के इस प्रकार से किये गये प्रयोग का जिक्र डॉ हैनीमेन ने अपने एक चिकित्सक मित्र से की। इस मित्र चिकित्सक ने भी डॉ. हैनीमेन के बताये अनुसार जड़ी का सेवन किया और उसे भी मलेरिया बुखार जैसे लक्षण पैदा हो गये। कुछ समय बाद उन्होंने शरीर और मन में औषधियों द्वारा उत्पन्न किये गये लक्षणों, अनुभवों और प्रभावों को लिपिबद्ध करना शुरू किया।


हैनीमेन की अति सूक्ष्म दृष्टि और ज्ञानेन्द्रियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि और अधिक औषधियों को इसी तरह परीक्षण करके परखा जाये। इस प्रकार से किये गये परीक्षणों और अपने अनुभवों को डॉ। हैनीमेन ने तत्कालीन मेडिकल पत्रिकाओं में मेडिसिन ऑफ एक्सपीरियन्सेस शीर्षक से लेख लिखकर प्रकाशित कराया। इसे होम्योपैथी के अवतरण का प्रारम्भिक स्वरूप कहा जा सकता है।

1 टिप्पणियाँ:

KAVITA RAWAT ने कहा…

Swasthyavardhak aur gyanvardhak jaankari uplabdh karakar hamara gyan vighyan badhane kee disha mein bahut hi umda post....हैनीमेन Jayanti ki haardik shubhkamnayne...

Related Posts with Thumbnails